सव्वेसिमासमाणं हिदयं गब्भो वसव्वसत्थाणं ।
सव्वेसिं वदगुणाणं पिंडो सारो अहिंसा हु॥796॥
सब आश्रम का हृदय यही है सब शास्त्रों का मर्म यही ।
सभी व्रतों का और गुणों का सार अहिंसा धर्म सही॥796॥
अन्वयार्थ : यह अहिंसा धर्म सर्व आश्रमों का हृदय है, सर्व शास्त्रों का रहस्य है, गर्भ है, सर्व व्रत-गुणों का सारभूत पिंड है ।

  सदासुखदासजी