
जम्हा असच्चवयणादिएहि दुक्खं परस्स होदित्ति ।
तप्परिहारो तह्मा सव्वे वि गुणा अहिंसाए॥797॥
क्योंकि असत्यवचन आदिक से अन्यजीव को दुख होता ।
अतः त्याग उन सबका ही गुण धर्म अहिंसा का होता॥797॥
अन्वयार्थ : क्योंकि असत्यवचन, परधनहरण, कुशीलसेवन, परिग्रह में आसक्ति - इनसे पर जीवों को दु:ख होने से हिंसा होती है । इसलिए असत्यवचनादि सर्वपापों का त्याग वे सभी अहिंसा ही के गुण हैं ।
सदासुखदासजी