जीववहो अप्पवहो जीवदया होइ अप्पणो हु दया ।
विसकंटओव्व हिंसा परिहरिदव्वा तदो होदि॥800॥
जीवों का वध अपना वध है जीव दया अपनी रक्षा ।
इसीलिए विषकंटक-सम ही तजने योग्य कही हिंसा॥800॥
अन्वयार्थ : जीवों का घात, वह अपना ही घात है और जीवों की दया, वह अपनी ही दया है, इसलिए जो कोई परजीव को एक बार मारेगा, वह स्वयं अनंतबार परजीवों से मारा जायेगा और जो अन्य जीवों की एक बार भी दया करेगा, वह स्वयं अनंतबार मरण से रहित होगा । अत: विष के काँटे के समान हिंसा का परित्याग करना योग्य है ।

  सदासुखदासजी