मारणसीलो कुणदि हु जीवाणं रक्खसुव्व उव्वेगं ।
संबंधिणो वि ण य विस्सम्भं मारिंतए जंति॥801॥
हिंसा करने वाले से राक्षसवत् सब जन डरते हैं ।
हिंसक का विश्वास नहीं सम्बन्धीजन भी करते हैं॥801॥
अन्वयार्थ : पर जीवों को मारने का है स्वभाव जिसका, ऐसा हिंसक जीव प्राणियों को राक्षस के समान उद्वेग करने वाला होता है । हिंसा करने वाला जीव अपने ही संबंधी माता, पिता, भ्राता के भी विश्वास योग्य नहीं होता है ।

  सदासुखदासजी