
वधबंधरोधधणहरणजादणाओ य वेरमिह चेव ।
णिव्विसयमभोजित्तं जीवे मारंतगो लभदि॥802॥
वध-बन्धन-धनहरण-मरण अरु बैर, देश से निष्कासन ।
जाति-बहिष्कारादिक का भी दण्ड प्राप्त करता हिंसक॥802॥
अन्वयार्थ : वध, मरण, बन्ध, बन्धन, रोध, बन्दीगृह में रोकना, बंद करना, धनहरण, शरीरजनित वेदना, समस्त जीवों से वैरीपना, विषयरहितपना और भोजन रहितपना, भोजन नहीं देना - ये सभी दु:ख जीवों को मारने वाले हिंसक के होते हैं ।
सदासुखदासजी