
कुद्धो परं वधित्ता सयंपि कालेण मारइज्जंते ।
हदघादयाण णत्थि विसेसो मुत्तूणं तं कालं॥803॥
मार अन्य को क्रोधी, फिर कुछ समय बाद खुद मर जाता ।
काल सिवा नहिं अन्य भेद है हत अरु घातक में होता॥803॥
अन्वयार्थ : क्रोधी जीव अन्य को प्रयत्नपूर्वक मारकर और स्वयं भी काल से/मृत्यु से मरण को प्राप्त होता है । मारने वाले का और मरने वाले का एक थोडे ही काल का अन्तर है, बहुत अन्तर नहीं है ।
सदासुखदासजी