
मारेदि एयमवि जो जीवं सो बहुसु जम्मकोडीसु ।
अवसो मारिज्जंतो मरदि बिधाणेहिं बहुएहिं॥805॥
एक जीव को भी जो मारे वह कोटि जन्मान्तर में ।
परवश होकर विविध रीति से वह भी मारा जाता है॥805॥
अन्वयार्थ : जो एक जीव को मारता है, वह अनेक करोड जन्मों में परवश होकर अनेक प्रकार के विधानों/उपायों से मारे जाने पर मारा जाता है ।
सदासुखदासजी