
जावइयाइं दुक्खाइं होंति लोयम्मि चदुगदिदाइं ।
सव्वाणि ताणि हिंसाफलाणि जीवस्स जाणाहि॥806॥
तीन लोक में चारों गतियों में जितने भी दुःख होते ।
उन सब दुःख को जीवों की हिंसा करने का फल जानो॥806॥
अन्वयार्थ : इस लोक की चारों गतियों में जितने दु:ख होते हैं, वे सभी दु:ख इस जीव को एक हिंसा का ही फल जानना ।
सदासुखदासजी