
हिंसादो अविरमणं वहपरिणामो य होइ हिंसा हु ।
तम्हा पमत्तजोगे पाणव्ववरोवओ णिच्चं॥807॥
हिंसा से अविरति हिंसा है और मारने का परिणाम ।
अतः प्रमत्त योग में निश्चित प्राणघातमय हिंसा जान॥807॥
अन्वयार्थ : हिंसा से विरक्त न होना अर्थात् त्याग नहीं करना, वही हिंसा है और जीवों के घात का परिणाम भी हिंसा है । अत: जीव का घात हो या न भी हो, परंतु जिसके मन-वचनकाय रूप योग यत्नाचार रहित प्रमाद रूप है, उसके निरंतर हिंसा ही है । इसलिए प्रमत्त योग से नित्य ही प्राण-व्यपरोपक/प्राणियों का हिंसक ही है ।
सदासुखदासजी