संकल्िों काि संरम्भ कहें, अरु सभारम्भ संताि प्रदान ।
उद्यम करना आरम्भ कहा, नष्ट करें ेवशुद्ध व्रत जान॥818॥
संकल्पों को संरम्भ कहें, अरु सभारम्भ संताप प्रदान ।
उद्यम करना आरम्भ कहा, नष्ट करें विशुद्ध व्रत जान॥818॥
अन्वयार्थ : प्रमादी पुरुष के, प्राणियों के प्राणों का अभाव करने में यत्न करना, उसे संरम्भ कहते हैं । हिंसादि क्रियाओं के कारणों का संयोग मिलाना या हिंसा के उपकरणों का संचय करना, उसे समारम्भ कहते हैं और हिंसा की क्रिया के कारणों का जो संचय किया था, उसका आद्य/प्रारम्भ, उसे आरम्भ कहते हैं । इन्हें मन-वचन-काय से तथा कृत-कारित-अनुमोदना से और क्रोध-मान-माया-लोभ से गुणित करने पर जीवाधिकरण के एक सौ आठ भेद होते हैं- 1. क्रोधकृत कायसंरम्भ, 2. मानकृत कायसंरम्भ, 3. मायाकृत कायसंरम्भ, 4. लोभकृत कायसंरम्भ, 5. क्रोधकारित कायसंरम्भ, 6. मानकारित कायसंरम्भ, 7. मायाकारित कायसंरम्भ 8. लोभकारित कायसंरम्भ, 9. क्रोधानुमत कायसंरम्भ, 10. मानानुमत कायसंरम्भ, 11. मायानुमत कायसंरम्भ, 12. लोभानुमत कायसंरम्भ, 13. क्रोधकृत वचनसंरम्भ, 14. मानकृत वचनसंरम्भ, 15. मायाकृत वचनसंरम्भ, 16. लोभकृत वचनसंरम्भ,17. क्रोधकारित वचनसंरम्भ 18. मानकारित वचनसंरम्भ 19. मायाकारित वचनसंरम्भ, 20. लोभकारित वचनसंरम्भ, 21. क्रोधानुमत वचनसंरम्भ, 22. मानानुमत वचनसंरम्भ, 23. मायानुमत वचनसंरम्भ, 24. लोभानुमत वचनसंरम्भ, 25. क्रोधकृत मन:संरम्भ, 26. मानकृत मन:संरम्भ, 27. मायाकृत मन:संरम्भ, 28. लोभकृत मन:संरम्भ, 29. क्रोधकारित मन:संरम्भ, 30. मानकारित मन:संरम्भ, 31. मायाकारित मन:संरम्भ, 32. लोभकारित मन:संरम्भ, 33. क्रोधानुमत मन:संरम्भ, 34. मानानुमत मन:संरम्भ, 35. मायानुमत मन:संरम्भ, 36. लोभानुमत मन:संरम्भ - ऐसे क्रोध, मान, माया, लोभ कषाय के वशीभूत होकर मन-वचन-काय से संरम्भ करने से, कराने से, अनुमोदना करने से संरम्भ के छत्तीस प्रकार हैं । ऐसे ही समारम्भ के छत्तीस प्रकार हैंऔर आरंभ के भी छत्तीस प्रकार हैं । इस तरह जीवाधिकरण के एक सौ आठ भेद हैं । संरम्भ तो हिंसा का संकल्प है, समारम्भ परिताप करने वाला है, आरम्भ अहिंसादि सभी उज्ज्वल व्रतों का दमन करने वाला है ।

  सदासुखदासजी