
सहसाणाभोगिय दुप्पमज्जिद अपच्चवेक्खणिक्खेवो ।
देहो व दुप्पउत्तो तहोवकरणं च णिव्वत्ति॥820॥
सहसा अनाभोग दुःप्रमृष्ट तथा अप्रत्यक्ष वेक्षित निक्षेप ।
निवर्तना के दो प्रकार हैं देह और उपकरण कहे॥820॥
अन्वयार्थ : 1. सहसा निक्षेपाधिकरण, 2. अनाभोग निक्षेपाधिकरण, 3. दु:प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण, 4. अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण - ऐसे निक्षेप के चार भेद हैं । उनमें निक्षिप्यते अर्थात् क्षेपिये - स्थापिये, उसे निक्षेप कहते हैं । भयादि से या अन्य कार्य करने की उतावली से शीघ्रता से पुस्तक, कमंडल, शरीर तथा शरीर का मलादि क्षेपना वह सहसा निक्षेपाधिकरण है । शीघ्रता नहीं होने पर भी "यहाँ जीव हैं या नहीं हैं" - ऐसा विचार ही नहीं करना और अवलोकन/देखे बिना ही शास्त्र, कमंडल, शरीर संबंधी मलादि निक्षेपण करना तथा वस्तु जहाँ धरना चाहिए, वहाँ नहीं धरना, जैसे तैसे अनेक जगह धरना अनाभोग निक्षेपाधिकरण है । दुष्टतापूर्वक या यत्नाचाररहितपने से उपकरण, शरीरादि का क्षेपना दुष्प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण है और बिना देखे वस्तु का निक्षेपण करना, रखना - स्थापन करना, वह अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण है । इस प्रकार ये चार प्रकार के निक्षेप कहे । अब दो प्रकार के निर्वर्तना कहते हैं । निपजाना, वह निर्वर्तना है । 1. शरीर से कुचेष्टा उत्पन्न करना, वह देह दु:प्रयुक्त है और 2. हिंसा के उपकरण शस्त्रादि की रचना करना/ बनाना, वह उपकरण निर्वर्तना है तथा सर्वार्थसिद्धि में पूज्यपाद स्वामीजी ने ऐसा कहा है कि निर्वर्तना अधिकरण दो प्रकार का है - एक मूलगुणनिर्वर्तना, एक उत्तरगुणनिर्वर्तना । उसमें से मूल पंचप्रकार- शरीर, वचन, मन, उच्छ्वास निश्वास का निपजाना और उत्तर काष्ठ, पुस्त, चित्रकर्मादि निपजाना- ऐसा कहा है ।
सदासुखदासजी