
संजोयणमुवकरणाणं च तहा पाणभोयणाणं ।
दुट्ठणिसिट्ठा मणवचिकाया भेदा णिसग्गस्स॥821॥
उपकरणों का संयोजन अरु भक्त-पान का संयोजन ।
मन-वच-तन की दुष्ट प्रवृत्ति तीन भेद निसर्ग पहिचान॥821॥
अन्वयार्थ : संयोजना अर्थात् संयोग दो प्रकार का है । एक तो शीतस्पर्शरूप जो पुस्तक तथा कमंडल, उन्हें धूप से तपाकर पीछी से पोंछना-शोधना इत्यादिक उपकरणसंयोजना है । दूसरा है पान/जलादि उसे दूसरे पानी आदि में मिलाना, भोजन में मिलाना तथा भोजन को पानी आदि में मिलाना या दूसरे भोजन में मिलाना, वह भक्तपानसंयोजना है । निसर्गाधिकरण तीन प्रकार का है । दुष्ट प्रकार से काय का प्रवर्तन करना, वह काय निसर्गाधिकरण है । दुष्ट प्रकार से वचन का प्रवर्तन करना, वह वाक्निसर्गाधिकरण है । दुष्ट प्रकार से मन का प्रवर्तन करना, वह मनोनिसर्गाधिकरण है ।
सदासुखदासजी