
जं जीवणिकायवहेण विणा इंदियकयं सुहं णत्थि ।
तम्हि सुहे णिस्संगो तम्हा सो रक्खदि अहिंसा॥822॥
जीव निकाय विघात बिना इन्द्रिय सुख हो उत्पन्न नहीं ।
अतः विमुख जो इन्द्रिय सुख से व्रत की रक्षा करे वही॥822॥
अन्वयार्थ : क्योंकि छह काय जीवों की हिंसा बिना इन्द्रिय जनित सुख नहीं होता है । इसलिए इन्द्रियजनित सुख में आसक्ति रहित हो, वही अहिंसा धर्म की रक्षा करता हैऔर जिसे इन्द्रियों के भोगों में सुख दिखता है, उसने आत्मीक सुख का लेश भी नहीं जाना, अत: बहिरात्मा है-मिथ्यादृष्टि है । जिसके आत्महिंसा का ही त्याग नहीं, उसने परजीवों की दया का लेश भी नहीं जाना । जिसे अपनी दया, उसे ही पर की दया और जिसने विषय-कषायों से अपने ज्ञानदश र्नभाव का घात किया, उस आत्मा ने नरकादि में अनंतानंतबार मरण प्राप्त किया । ऐसे आत्मघाती के कदापि छह काय के जीवों की दया ही नहीं जाननी/होती, इसलिए भगवान का ऐसा हुकुम है कि अपने में राग-द्वेषादि की उत्पत्ति, वही हिंसा है और रागादि की अनुत्पत्ति, वह अहिंसा है ।
सदासुखदासजी