
जीवो कसायबहुलो संतो जीवाण घायणं कुणइ ।
सो जीववहं परिहरदु सया जो णिज्जियकसाओ॥823॥
तीव्र कषाय सहित होकर जीवों की हिंसा करता जीव ।
अतः कषायजयी जो होता वह हिंसा से बचता जीव॥823॥
अन्वयार्थ : जिस जीव के कषायों की अधिकता रहती है, वह जीव प्राणियों का घात करता है और जो कषायों को जीतने वाला है, वह सदा काल जीवों की हिंसा का परित्याग करता है और कषायों सहित प्रवर्तना, वह तो अपने आत्मा का घात करना है तथा उत्तमक्षमादिरूप कषायरहित प्रवर्तना, वह अपनी आत्मा की रक्षा है । इस लोक में भी रक्षा है और आगामी काल में भी अनंतानंत जन्म-मरण से अपनी रक्षा करना/बचाना है ।
सदासुखदासजी