
आदाणे णिक्खेवे वोसरणे ठाणगमणसयणेसु ।
सव्वत्थ अप्पमत्तो दयावरो होदु हु अहिंसा ॥824॥
वस्तु ग्रहण में रखने में चलने अथवा शयनादिक में ।
यत्नाचार प्रवृत्ति दयालु होकर करे अहिंसक है॥824॥
अन्वयार्थ : जो कमंडल, पीछी, शास्त्र को ग्रहण करने में तथा रखने में, उठाने में तथा खडे रहने में, गमन करने में, शयन में, समेटने में, उलट-पलट होने आदि सम्पूर्ण क्रियाओं में जीवदया सहित यत्नाचार पूर्वक प्रवर्तते हैं, वे जीव अहिंसक होते हैं ।
सदासुखदासजी