
काएसु णिरारंभे फासुगभेजिम्मि णाणहिदयम्मि ।
मणवयणकायगुत्तिम्मि होइ सयला अहिंसा हु॥825॥
आरम्भ त्यागी प्रासुक भोजी ज्ञान भावना में रत है ।
मन-वच-तन गुप्ति धारी जो सकल अहिंसाव्रती वही॥825॥
अन्वयार्थ : जो षट्काय के जीवों में आरम्भ रहित है और छयालीस दोष, बत्तीस अन्तराय, चौदह मल पूर्व में कहे गये हैं, उन्हें टालकर गृहस्थ के घर नवधा भक्तिपूर्वक दिया हुआ, अयाचिकवृत्ति से, गृद्धता/लंपटता से रहित, मौनावलम्बी, एक दिन में एकबार अथवा बेला, तेला, पंचोपवास, पक्ष के, मास के, उपवासों के पारणा इन्द्रियों का निग्रह करके, खारा, अलूना, ठंडा, गर्म, रसवान वा नीरस जो दातार ने साधु के लिये नहीं बनाया हो - ऐसा प्रासुक भोजन करते हैं और ज्ञानाभ्यास में सदाकाल रत हैं, मन-वचन-काय से चलायमानपने से रहित तीन गुप्ति रूप रहते हैं, उन साधुओं को परिपूर्ण अहिंसाव्रत होता है ।
सदासुखदासजी