
आरंभे जीववहो अप्पासुगसेवणे य अणुमोदो ।
आरंभादीसु मणो णाणरदीए विणा चरइ॥826॥
आरम्भ में हिंसा अप्रासुक भोजन में भी अनुमोदन ।
ज्ञान लीनता बिना प्रवृत्ति आरम्भ और कषायों में॥826॥
अन्वयार्थ : जिस साधु के आरम्भ में जीवों का घात होता है, अप्रासुकद्रव्य के सेवन में अनुमोदना रहती है और आरंभ करने में मन लगा रहता है, वे ज्ञान में लीनता बिना आचरण करते हैं । यदि भगवान के परमागम की शरण ग्रहण की होती तो ऐसी मलिन औंली/उल्टी प्रवृत्ति नहीं करते । ऐसी प्रवृत्ति करने वाला साधु अज्ञान से संसार में परिभ्रमण करेगा ।
सदासुखदासजी