तम्हा इहपरलोए दुक्खाणि सदा अणिच्छमाणेण ।
उवओगो कायव्वो जीवदयाए सया मुणिणो॥827॥
इसीलिए इस-भव पर-भव में नहीं चाहते जो दुःख को ।
वे मुनि जीव-दया पालन में सदा लगायें निज उपयोग॥827॥
अन्वयार्थ : इसलिए इस लोक में और परलोक में दु:खों को नहीं चाहने वाले मुनि, उन्हें जीवों की दया में हमेशा उपयोग लगाने योग्य है । जीवों की दया ही धर्म है; अत: साधुजन कभी भी प्रमादी नहीं होते, सदा यत्नाचार रूप ही प्रवर्तन करते हैं ।

  सदासुखदासजी