पाणो वि पाडिहेरं पत्तो छूढो वि सुं सुमारहदे ।
एगेण एक्कदिवसक्कदेण हिंसावदगुणेण॥828॥
चाण्डाल भी एक दिवस को हुआ अहिंसाव्रत धारी ।
मगरमच्छ पूरित सर में उसको फेका पर सुर पूजित॥828॥
अन्वयार्थ : शिश्रुुमार नामक द्रह/समुद्र में मारने को क्षेप्या/डाला गया चांडाल भी एक दिन के किये गये अहिंसाव्रत नामक एक गुण के कारण देवों द्वारा किये गये सिंहासनादि प्रातिहार्य को प्राप्त हुआ! तो जो और भी उत्तम आचार का धारक यावज्जीव/जीवन पर्यंत अहिंसा नामक व्रत पालेगा, उसके प्रभाव को कहने में कौन समर्थ है? ऐसे अनुशिष्टि नामक तेतीसवें महा अधिकार में अहिंसाव्रत का उपदेश वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी