
परिहर असंतवयणं सव्वं पि चदुव्विधं पयत्तेण ।
धत्तं पि संजमिंतो भासादोसेण लिप्पदि हु॥829॥
सर्व चतुर्विध असत्वचन का यत्नसहित परिहार करो ।
संयमधर भी वचन दोष से कर्म लिप्त हो जाते हैं॥829॥
अन्वयार्थ : भो मुने! 'असत्' जो अशोभता, बुरा, खोटा - ऐसे वचनों का प्रयत्न पूर्वक त्याग करना, क्योंकि अतिशयरूप संयम को प्राप्त होनेवालेे साधु भी चार प्रकार की दुष्टभाषा के दोषों से अत्यंत लिप्त हो जाते हैं ।
सदासुखदासजी