+ आगे चार प्रकार के असत्यवचन कहते हैं- -
पढमं असंतवयणं संभूदत्थस्स होदि पडिसेहो ।
णत्थि णरस्स अकाले मच्चुत्ति जधेवमादीयं॥830॥
प्रथम असत्य वचन यह जानो विद्यमान वस्तु का लोप ।
नहिं अकाल मृत्यु मनुष्य की - एेसा कहना सत् का लोप॥830॥
अन्वयार्थ : विद्यमान पदार्थ का प्रतिषेध करना, वह प्रथम असत्य है । जैसे कर्मभूमि के मनुष्य की अकाल में मृत्यु का निषेध करना इत्यादि प्रथम असत्य है ।

  सदासुखदासजी