अहवा जं उब्भावेदि असंतं खेत्तकालभावेहिं ।
अविधारिय अत्थि इहं घडोत्ति जह एवमादीयं॥833॥
अथवा क्षेत्र-रु काल भाव से करे असत् का उद्भावन ।
बिना विचारे कहना जैसे ’घट है’ एेसा कहे वचन॥833॥
अन्वयार्थ : अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावों को विचारे बिना अविद्यमान वस्तु को प्रगट करना, यह दूसरा असत्यवचन है । जैसे - द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावों को समझे बिना यहाँ घट है - ऐसा कहना, इत्यादि की तरह और भी बहुत प्रकार का असत्य जानना ।

  सदासुखदासजी