अन्वयार्थ : - जो वचन परुष/कठोर हों, कर्ण को, मन को कटुक हों तथा जिस वचन से जो वचन परुष/कठोर हों, कर्ण को, मन को कटुक हों तथा जिस वचन से अति वैर हो जाये, जो अनेकों जन्मों तक भी नहीं छूटें, जिस वचन से तत्काल कलह प्रगट हो जाये, जिससे दुर्वचन प्रगट हो, मारा-मारी मच जाये, वह [[कलहकारी वचन]] है ।
- जिस वचन से पर जीवों के भय उत्पन्न हो जाये, जिस वचन से मरण से भी अधिक क्लेश हो जाये, सुनते ही विषभक्षण करके मर जाये, शस्त्रघात करके मर जाये, जल में डूबकर मर जाये - ऐसा [[उत्त्रासनवचन]] है और
- जिस वचन से तिरस्कार हो जाये - अपमान हो जाये - ये सभी संक्षेप से [[अप्रिय वचन]] के भेद हैं । कर्कश, कटुक, परुष, निष्ठुर, परकोपिनी, मध्यकृशा, अभिमानिनी, अनयंकरी, छेदंकरी, भूतवधकरी - ये दश प्रकार की महानिंद्य पाप करनेवाली भाषा त्यागने योग्य है । उनमें जो -
- "तू मूर्ख है! बैल है! ढोर है! रे मूर्ख, तू कुछ भी नहीं समझता! पशु समान है!" इत्यादि संताप उत्पन्न करनेवाली [[कर्कश भाषा]] है ।
- तू कुजाति है, नीच जाति है, अधर्मी है, महापापी है, स्पर्शन करने योग्य भी नहीं - इत्यादि उद्वेग करनेवाली जो भाषा, वह [[कटुक भाषा]] है ।
- तू अनेक देश दुष्ट/ देशों से दुष्टता रखनेवाला है, तू आचार से पराङ्मुख है, भ्रष्टाचारी है - इत्यादि मर्म को छेदनेवाली [[परुष भाषा]] है ।
- मैं तुझे मार डालूँगा! तेरा मस्तक काट डालूँगा, तुझे त्रास दूँगा! इत्यादि [[निष्ठुर भाषा]] है ।
- और ऐसा कहे - रे निर्लज्ज! तेरा क्या तप है! रे कुशील! तेरा काहे का शील? तू रागी है, तू हँसी के योग्य है, जगतनिंद्य है, तू अभक्ष्य भक्षण करनेवाला है, तेरा नाम लेने से सारा कुल लज्जित होता है- इत्यादि कोप करानेवाली भाषा, वह [[परकोपिनी भाषा]] है ।
- जिस निष्ठुरवाणी से हृदय/छाती के बीच में छेद हो जाये, सुनते ही हड्डियों की शक्ति नष्ट हो जाये, वह [[मध्यकृशा भाषा]] है ।
- लोक में अपने गुण प्रगट करना और पर के दोषों को बढा-चढा कर कहना तथा कुल, जाति, रूप, बल, ऐश्वर्य, विज्ञानादि के मदयुक्त वचन बोलना, वह [[अभिमानिनी भाषा]] है ।
- शील खंडन करनेवाली और विद्वेष करने वाली भाषा, वह [[अनयंकारी भाषा]] है ।
- वीर्यशील गुणादि निर्मूल करनेवाली और असद्भूत/असत्य दोष प्रगट करनेवाली [[छेदंकरी भाषा]] है ।
- और जिस वाणी से प्राणियों को अशुभ वेदना हो या प्राणों का नाश हो जाये, वह सभी अनिष्ट करनेवाली [[भूतवधंकरी भाषा]] है
इन दश प्रकार की भाषाओं को प्राण जाने पर भी बोलना योग्य नहीं है ।
ये सभी पापों की खान हैं और पर को दु:ख देने वाली हैं, इसलिए ज्ञानियों को त्यागने योग्य हैं ।
- स्त्रियों के शृंगार, हाव-भाव, विलास, विभ्रमरूप क्रीडा, व्यभिचारादि की कथा, काम को जागृत/उत्तेजित करनेवाली, ब्रह्मचर्य का नाश करनेवाली [[स्त्रियों की कथा]],
- भोजन-पान में राग उत्पादक [[भोजनकथा]],
- रौद्रकर्म की उत्पादक रौद्रध्यान करानेवाली [[राजकथा]],
- [[चोरों की कथा]],
- मिथ्यादृष्टि कुलिंगियों की कथा,
- धन उपार्जन करने की कथा,
- वैरी/दुष्टों का तिरस्कार करने की कथा,
- हिंसा के प्रेरक कुशास्त्रों की कथा,
सर्वथा/बिलकुल भी करने योग्य नहीं, सुनने योग्य नहीं, महान पापास्रव की करानेवाली
[[अप्रिय भाषा]] है, वह त्यागने योग्य है ।