+ अब अप्रियवचन का स्वरूप कहते हैं- -
परुसं कडुयं वयणं वेर कलह च जं भयं कुणइ ।
उत्तासणं च हीलणमप्पियवयणं समासेण॥838॥
कटुक कठोर वचन अरु जिनसे बैर कलह भय हो उत्पन्न ।
त्रासद और तिरस्कारक हैं अप्रिय - यह संक्षेप कथन॥838॥
अन्वयार्थ : ये सभी पापों की खान हैं और पर को दु:ख देने वाली हैं, इसलिए ज्ञानियों को त्यागने योग्य हैं । सर्वथा/बिलकुल भी करने योग्य नहीं, सुनने योग्य नहीं, महान पापास्रव की करानेवाली [[अप्रिय भाषा]] है, वह त्यागने योग्य है ।

  सदासुखदासजी