+ अब चार प्रकार के असत्यवचन त्यागरूप हैं, यह कहते हैं- -
हासभयलोहकोहप्पदोसादीहिं तु मे पयत्तेण ।
एवं असंतवयणं परिहरिदव्वं विसेसेण॥839॥
हास्य लोभ भय क्रोध द्वेष से प्रेरित हो जो कहें वचन ।
यत्नपूर्वक त्याग विशेष करो मुनि ये सब असत्वचन॥839॥
अन्वयार्थ : भो ज्ञानी! हास्य से, भय से, लोभ से, क्रोध से द्वेष करके ये चार प्रकार के असत्य वचन तुम मत कहो, विशेष प्रयत्न करके इनका त्याग करना ।

  सदासुखदासजी