
तव्विवरीदं सव्वं कज्जे काले मिदं सविसए य ।
भत्तादिकहारहियं भणाहि तं चेव सुयणाहि॥840॥
इनसे जो विपरीत सत्य वह कार्य1 काल2 मित3 विषय स्वरूप4 ।
भोजन आदि कथा विरहित ये वचन कहो अरु इन्हें सुनो॥840॥
अन्वयार्थ : भो मुने! तुम्हारे ज्ञान-चारित्रादि की शिक्षारूप कोई कार्य हो तथा आवश्यक का काल छोडकर कोई धर्म का अवसर हो, तुम्हारे ज्ञान का कोई विषय हो तो उस समय में सत्यवचन कहो । कैसा है सत्यवचन? पूर्व में कहे गये जो चार प्रकार के असत्य वचन, उससे उल्टा है और भोजनकथा, राजकथा, स्त्रीकथा, देशकथा इत्यादि विकथाओं से रहित है, उसे तुम प्रयोजनवश कहो और विकथादि रहित सत्य ही श्रवण करो । धर्मरहित असत्य निष्प्रयोजन वचन मत कहो और कदाचित् श्रवण भी मत करो ।
सदासुखदासजी