जलचंदणससिमुत्ताचंदमणी तह णरस्स विव्वाणं ।
ण करंति कुणइ जह अत्थज्जुयं हिदमधुरमिदवयणं॥841॥
जल चन्दन शशि चन्द्रकान्तमणि मुक्तादिक भी दे न सकें ।
जो सुख सार्थक हित मित मधुर वचन से वह सुख प्राप्त करें॥841॥
अन्वयार्थ : जैसे यह जीव को हितरूप और अर्थसहित है - ऐसे मिष्टवचन सुख करते हैं, निराकुल, सांसारिक आताप से दु:खरहित करते हैं; तैसे जल, चंदन, चन्द्रमा, मोतियों का हार, चन्द्रकान्तमणि अन्तर्गत आताप हर कर सुख नहीं करते हैं ।

  सदासुखदासजी