
अण्णस्स अप्पणो वा वि धम्मिए विद्दवंतए कज्जे ।
जं अपुच्छिज्जंतो अण्णेहिं य पुच्छिओ जंप॥842॥
यदि अपने या अन्य जनों के धर्मकार्य होते हों नष्ट ।
बिन पूछे भी कहो अन्यथा पूछे तो ही कहो वचन॥842॥
अन्वयार्थ : भो मुने! यदि बोले बिना अन्य जीवों का या आप का धर्मरूप कार्य का विनाश होता हो तो बिना पूछे ही बोलना उचित है और दूसरे कार्य में कोई पूछे तो बोलना, वह भी दूसरे का और अपना हित होता जाने तो बोलना । यदि बोलने में धर्म मलिन हो जाये तो बोलना ही नहीं ।
सदासुखदासजी