
ण डहदि अग्गी सच्चेण णरं जलं च तं ण बुड्डेिइ ।
सच्चबलियं खु पुरिसं ण वहदि तिक्खा गिरिणदी वि॥844॥
नहीं अग्नि में जले न डूबे जल में कभी सत्यवादी ।
तीव्र वेगयुत सरिता में नहिं बहे सत्य का बल धारी॥844॥
अन्वयार्थ : सत्य के प्रभाव से मनुष्य को अग्नि भी नहीं जलाती है, जल भी नहीं डुबो सकता है । जो पुरुष सत्य से बलवान है, उसे तीव्र वेगसहित पर्वत से गिरती हुई नदी भी नहीं बहा सकती ।
सदासुखदासजी