सच्चेण देवदावो णवंति पुरिसस्स होंति य वसम्मि ।
सच्चेण य गहगहिदं मोएइ करेंति रक्खं च॥845॥
देव नमें अरु नर के वश में होते सुर यह सत्य प्रभाव ।
जो पिशाचयुत नर भी छूटे करें देव उसकी रक्षा॥845॥
अन्वयार्थ : सत्य के प्रभाव से पुरुष को देवता भी नमस्कार करते हैं, सत्य से देवता भी पुरुष के वशीभूत हो जाते हैं, सत्य ही पिशाच से ग्रस्त पुरुष को छुडाता है तथा सत्य ही पुरुष की रक्षा करता है ।

  सदासुखदासजी