सच्चेण जगे होदि पमाणं अण्णो गुणो जदि वि से णत्थि ।
अदिसंजदो य मोसे ण होदि पुरिसेसु तणलहुओ॥849॥
यदि अन्य गुण नहीं, किन्तु हो सत्य मनुज प्रामाणिक हो ।
संयमधारी यदि असत्य बोले तो तृणवत् तुच्छ रहे॥849॥
अन्वयार्थ : यदि पुरुष अन्य गुणों से रहित भी हो तो भी सत्य के द्वारा जगत में वह पुरुष प्रमाण करने योग्य होता है और मृषा/असत्य से, अति संयमी भी लोक में तृण-समान लघु होता है ।

  सदासुखदासजी