होदु सिहंडी व जडी मुंडो वा णग्गओ व चीवरधरो ।
जदि भणदि अलियवयणं विलंवणा तस्स सा सव्वा॥850॥
शिखा धरे नर जटा धरे या मुण्ड नग्न हो चीर धरे ।
यदि असत्य बोले तो उसकी है विडम्बना मात्र अरे॥850॥
अन्वयार्थ : शिखावान हो, जटा धारण भी किये हो, मूँड मुँडाई हो, नग्न रहता हो या अनेक वस्त्र धारण करता हो; परंतु जो असत्यवचन बोलता है, उसकी सर्व बाह्यक्रिया विडंबनारूप है ।

  सदासुखदासजी