जह परमण्णस्स विसं विणासयं जेह व जोव्वणस्स जरा ।
तह जाण अहिंसादी गुणाण य विणासयमसच्चं॥851॥
विष उत्तम भोजन का नाशक जरा विनाशक यौवन की ।
अहिंसादि गुण के नाशक हैं जानो वचन असत्य सभी॥851॥
अन्वयार्थ : जैसे उत्तम भोजन को विष विनष्ट करता है, विष मिलाने से मिष्ट भोजन भी विषरूप हो जाता है तथा जैसे जरा यौवन का नाश करती है; वैसे असत्य को अहिंसादि सर्व गुणों का नाश करनेवाला जानना ।

  सदासुखदासजी