
मादाए वि य वेसो पुरिसो अलिएण होइ इक्केण ।
किं पुण अवसेसाणं ण होइ अलिएण सत्तुव्व॥852॥
मादाए ेव य वसिाि िुपरसाि एलएण हािइ इक्कणि ।
किं िुण अवससिाणं ण हािइ एलएण सत्तुव्व॥852॥
अन्वयार्थ : यह पुरुष एक असत्य के कारण माता के भी द्वेष/अविश्वास करने योग्य होता है तो असत्य के कारण अन्य लोगों को शत्रु के समान द्वेष करने योग्य नहीं होगा क्या? होगा ही होगा ।
सदासुखदासजी