
अप्पच्चओ अकित्ती भंभारदिकलहवेरभयसोगा ।
वधबंधभेदणाणा सव्वे मोसम्मि सण्णिहिदा॥854॥
अविश्वास अपयश संक्लेश अरति बैर भय शोक कलह ।
वध बन्धन गृह कलह तथा धन नाश करे यह वचन असत्॥854॥
अन्वयार्थ : असत्यवचन के पास इतने दोष बसते हैं - अप्रतीति होती है, झूठे की किसी को भी प्रतीति नहीं होती है तथा अपकीर्ति होती है, झूठे का जगत में अपवाद ही होता है । असत्यवचनों से स्वयं को तथा अन्य जीवों को संक्लेश होता है, झूठे व्यक्ति में सबको अरति होती है और झूठ बोलने में कलह, वैर, भय तथा शोक प्रगट होते हैं । झूठ बोलने वाला वध/ मरण, बंधन- नानाप्रकार के दु:खरूप बन्दीगृह में बंधन को प्राप्त होता है । असत्य से मित्रादि की प्रतीति में भेद/अन्तर हो जाता है तो प्रीतिभंग होती ही है तथा असत्यवचन से धन का नाश होता है - इत्यादि बहुत दोष आते हैं ।
सदासुखदासजी