
पापस्सासवदारं असच्चवयणं भणंति हु जिणिंदा ।
हिदएण अपावो वि हु मोसेण गदो वसू णिरयं॥855॥
पापों के आस्रव का द्वार असत्य, कहें यह श्री जिनदेव ।
राजा वसु निष्पाप हृदय, पर झूठ बोलकर नरक गए॥855॥
अन्वयार्थ : जिनेन्द्र भगवान असत्यवचन को पाप आने का द्वार कहते हैं । देखो! हृदय में पाप रहित होने पर भी वसु नामक राजा झूठ वचन से नरक में गया ।
सदासुखदासजी