
लोभे च वह्निदे पुण कज्जाकज्जं णरो ण चिंतेदि ।
तो अप्पणो वि मरणं अगणिंतो साहसं कुणदि॥863॥
लोभ बढ़े तब यह नर करता कार्य-अकार्य विचार नहीं ।
दुःसाहस करता अपने मरने की भी परवाह नहीं॥863॥
अन्वयार्थ : इस नर को लोभ की वृद्धि होने पर 'यह करने योग्य है या नहीं करने योग्य है', वह कार्य-अकार्य का चिंतवन नहीं करता है । तत:/युक्त-अयुक्त के विचार के अभाव से अपने मरण को भी नहीं गिनते हुए महा साहस करता है, चोरी करता है ।
सदासुखदासजी