अत्थम्मि हिदे पुरिसो उम्मत्तो विगयचेयणो होदि ।
मरदि व हक्कारकिदो अत्थो जीवं खु पुरिसस्स॥865॥
धन हरने पर नर होता उन्मत्त और चेतना विहीन ।
करके हाहाकार मरे, यह धन मनुष्य का प्राण कहा॥865॥
अन्वयार्थ : सब ही लोक अर्थ/धन में स्थायी बुद्धि है जिसकी ऐसा है, उस धन का कोई हरण कर ले तो जैसे हृदय में शक्ति नामक आयुध के प्रहार से वेधे गये पुरुष के समान अति दु:खी होता है और धन का हरण होने से पुरुष उन्मत्त हो जाता है, बावला/पागल हुआ बकवाद करता है । वस्त्रादि की सुध नहीं रहती तथा चेतना/ज्ञानचेतना से रहित हो जाता है । 'हाय! हाय!' करता हुआ महादु:ख सहित मरण करता है । इसलिए इस पुरुष का धन है, वही जीव है । जिसने अन्य का धन हरण किया, उसने प्राण ही हर लिये । प्राणहरण से भी धनहरण तथा जीविकाहरण का दु:ख बहुत अधिक होता है ।

  सदासुखदासजी