अत्थे संतम्मि सुहं जीवदि सकलत्तपुत्तसंबंधी ।
अत्थं हरमाणेण य हिदं हवदि जीविदं तेसिं॥867॥
धन हो तो नर सुत नारी परिजन के संग सुख से जीता ।
धन हरने पर उन सबका भी जीवन हरण किया जाता॥867॥
अन्वयार्थ : यह मनुष्य धन के लिये महान भयंकर सिंह, व्याघ्र, गज, सर्पादि से भरे हुए वन में प्रवेश करता है, पर्वतों की भयंकर गुफाओं में प्रवेश करता है, महा भयंकर समुद्र में तथा शस्त्रों के संताप से जहाँ अनेक योद्धाओं के बीच हस्ति, घोडों के रुधिर के प्रवाह से अति विषम जहाँ शस्त्रों द्वारा अंधकार (घमासान मच रहा हो) हो रहा - ऐसे विषम संग्रामस्थान में प्रवेश करता है । अपने प्राणों से प्यारे स्त्री, पुत्र, मित्र, बांधवादि को छोडकर तथा अपने जीने की आशा छोडकर वन, पर्वत, गुफा, नदी, समुद्र, संग्राम इत्यादि में प्रवेश करता है । अत: धन होने पर स्त्री-पुत्रादि कुटुम्ब सहित जैसे सुख हो, वैसे जीता है । ऐसे महाक्लेश से उत्पन्न किये धन को जो चुराता है, लूटता है, वह महापापी - पर का धन हरने वाला पुरुष, उसने दूसरे जीवों के सब कुटुम्ब सहित प्राण हरण किये ।

  सदासुखदासजी