चोरस्स णत्थि हियए दया च लज्जा दमो व विस्सासो ।
चोरस्स अत्थहेदुं णत्थि य कादव्वयं किं पि॥868॥
चोरों में विश्वास दया लज्जा अरु साहस नहिं होता ।
कुछ भी कर सकते धन हेतु उन्हें अयोग्य न कुछ होता॥868॥
अन्वयार्थ : चोर के जगत में न करने योग्य ऐसा कोई भी अधर्म कर्म शेष नहीं रहा, जो धन के लिये उसने न किया हो ।

  सदासुखदासजी