
अण्णं अवरज्झंतस्स दिंति णियये घरम्मि आवासं ।
माया वि य ओगासं ण देह चोरिक्कसीलस्स॥870॥
अन्य कोई अपराध करे पर, जन घर में आश्रय देते ।
किन्तु चोर को मात-पिता भी कभी नहीं आश्रय देते॥870॥
अन्वयार्थ : हिंसादि अन्य अपराध करनेवाले पुरुष का लोक में कोई पक्ष करनेवाला भी होता है, मगर चोरी करने का जिसका स्वभाव है - ऐसे चोर का माता, स्त्री, पिता, पुत्र, बंधु आदि कोई भी पक्ष करनेवाला नहीं होता । दूसरे कोई भी अपराध किये हों, उसे तो कोई हितेच्छुक मित्र, बांधवादि अपने गृह में रहने को स्थान - अवकाश दे भी देते हैं, परंतु चोरी करनेवाले को तो अपनी माता भी अवकाश नहीं देती है ।
सदासुखदासजी