
परदव्वहरणमेदं आसवदारं खु वेंति पावस्स ।
सोगरियवाहपरदारएहिं चोरो हु पापदरो॥871॥
परद्रव्यों का हरण पाप के आने का है द्वार कहा ।
पर-घातक पर-नारीरत से चोरी में बहु पाप कहा॥871॥
अन्वयार्थ : शिकारियों से, वध करनेवालों से तथा परस्त्री के लम्पटियों से भी परधन हरण करने का पाप अधिकतर है और परद्रव्य के हरने को पापों के आने का द्वार कहा है ।
सदासुखदासजी