
सयणं मित्तं आसयमल्लीणं पि य महल्लए दोसे ।
पाडेदि चोरियाए अयसे दुक्खम्मि य महल्ले॥872॥
बन्धु मित्र आश्रित जन भी ये बुरे काम करने लगते ।
वे भी चोरी करके अपयश अरु दुःख के भागी होते॥872॥
अन्वयार्थ : चोरी करनेवाला चोर अपने स्वजनों को, मित्रों को, समीप में रहने वालों को, स्थान को महान दोषों में पटकता है, अपयश में तथा महान दु:ख में पटकता है ।
सदासुखदासजी