बंधवधजादणाओ छायाघादपरिभवभयं सोयं ।
पावदि चोरो सयमवि मरणं सव्वस्सहरणं वा॥873॥
वध बन्धन अरु तिरस्कार भय शोक और सर्वस्व हरण ।
चोर स्वयं ये सब दुःख भोगे और अन्त में करे मरण॥873॥
अन्वयार्थ : चोरी करनेवाला पुरुष बेडी, साँकल, खोडों के बन्धन तथा अनेक प्रकार की ताडना तथा तीव्र वेदना को प्राप्त होता है । चोर की छाया/शरीर की कांति भी बिगड जाती है । जगत में तिरस्कार को पाता है । चोर निरन्तर भयवान होता है । शोक को प्राप्त होता है । स्वयमेव मरण को प्राप्त होता है तथा राजादि के द्वारा चोर का सारा धन हर लिया जाता है ।

  सदासुखदासजी