णिच्चं दिवा य रत्तिं च संकमाणो ण णिद्दमुवलभदि ।
तेणं तओ समंता उव्विग्गमओ य पिच्छंतो॥874॥
निश-दिन पकड़े जाने की आशंका से वह सो न सके ।
भय से ग्रस्त हिरन की भाँति देखे चारों ओर अरे!॥874॥
अन्वयार्थ : चोर उद्वेग को प्राप्त होकर मृग की तरह सर्व ओर अवलोकन करता हुआ सदा ही शंकित रहता है, दिन या रात्रि में भी निद्रा नहीं लेता या सो नहीं सकता ।

  सदासुखदासजी