उंदुरकंदपि सद्दं सुच्चा परिवेवमाणसव्वंगो ।
सहसासमुत्थिदभओ उव्विग्गो धावदि खलंतो॥875॥
चूहे की आवाज सुने पर रोम-रोम थर-थर काँपे ।
हो भयभीत तुरत घबरा कर दौड़े पद-पद गिरे उठे॥875॥
अन्वयार्थ : चूहे का भी शब्द सुनकर कम्पायमान हो जाते हैं सर्व अंग जिसके - ऐसा चोर पुरुष शीघ्र ही भय से उद्वेग को प्राप्त होता हुआ गिरता-पडता दौडता है ।

  सदासुखदासजी