धत्तिं पि संजमंतो घेत्तूण किलिंदमेत्तमविदिण्णं ।
होदि हु तणं व लहुओ अप्पच्चइओ य चोरो व्व॥876॥
बहु संयमधारी साधु भी बिना दिये तृण मात्र गहें ।
तो विश्वास विहीन चोरवत् तृण समान वे लघु होवें॥876॥
अन्वयार्थ : अतिशय रूप से संयम पालने वाले साधु बिना दिये तृणमात्र भी ग्रहण करने से तृण समान लघु हो जाते हैं और चोर की तरह प्रतीतिरहित होते हैं ।

  सदासुखदासजी