
तिरियगदीए वि तहा चोरी पाउणदि तिव्वदुक्खाणि ।
पाएण णीयजोणीसु चेव संसरइ सुचिरंपि॥878॥
यदि जाये तिर्यंच गति में तो भी तीव्र कष्ट भोगे ।
प्रायः नीच योनियों में ही जन्म-मरण चिरकाल करे॥878॥
अन्वयार्थ : जैसे चोर नरकगति में तीव्र दु:ख पाता है, वैसे ही तिर्यंचगति में भी तीव्र दु:खों को प्राप्त होता है और चोरी करनेवाला बहुत - असंख्यातकालपर्यंत नीच योनि कूकर, सूकर, गर्दभ/गधा, महिषादि/भैंसादि तथा विकलत्रयादि योनियों में अधिकपने से परिभ्रमण करता है ।
सदासुखदासजी