
माणुसभवे वि अत्था हिदा व तस्स णस्संति ।
ण य से धणमुवचीयदि सयं च ओलट्टदि धणादो॥879॥
नर भव में भी उसका धन चोरी होता या स्वयं विनष्ट ।
यदि धन संचय हो भी तो वह उससे रहता है वंचित॥879॥
अन्वयार्थ : चोर कदाचित् मनुष्य भव भी पाये तो मनुष्य भव में भी उसका धन किसी से हरण किया हुआ या बिना हरण किया नाश को प्राप्त होता है और उसको धन का संचय नहीं होता तथा जहाँ धन हो, वहाँ से स्वयं दूर निकल जाता है । चोरी करने का फल अनेक जन्मों तक अति घोर दु:खों को पाना है ।
सदासुखदासजी