
परदव्वहरणबुद्धी सिरिभूदी णयरमज्झयारम्मि ।
होदूण हदो पहदो पत्तो सो दीहसंसारं॥880॥
परधन में आसक्त श्रीमती नामक इक ब्राह्मण ताड़ित ।
हुआ नगर के बीच मृतक फिर मरकर दीरघ संसारी॥880॥
अन्वयार्थ : पर का धन हरने की है बुद्धि जिसकी - ऐसा श्रीभूति नामक राजा का पुरोहित नगर में ही अनेक वेदनाओं द्वारा ताडित, प्रहत अर्थात् अनेक प्रकार के त्रासों से मरकर दीर्घ संसार-परिभ्रमण को प्राप्त हुआ ।
सदासुखदासजी