एदे सव्वे दोसा ण होंति परदव्वहरणविरदस्स ।
तव्विवरीदा य गुणा होंति सदा दत्तभोइस्स॥881॥
जो परद्रव्य-हरण का त्यागी उसे न होते ये सब दोष ।
दत्त वस्तु को ही जो भोगे दोषों से विपरीत अदोष॥881॥
अन्वयार्थ : और जो परद्रव्य हरण करने का त्यागी है, उसके ये सभी दोष नहीं होते । जो पर का दिया हुआ भोगेगा, उसके पूर्व में जो चोर के दोष कहे हैं, उनसे उलटे गुण ही सदा होते हैं ।

  सदासुखदासजी